Tuesday, February 15, 2011

अल्ला के दरबार में पांच सितारा होटल खुरशीद आलम

किसी उपासना स्थल का निर्माण एवं उसकी देखभाल और वहां आने वाले आगंतुकों का विशेष रूप से ध्यान रखना हर लिहाज से सराहनीय कार्य है। यदि वह उपासना स्थल केंद्रीय दर्जा रखता हो तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसे में उपासना स्थल की देखभाल करने वालों से यह आशा की जाती है कि वे निःस्वार्थ भाव से यह काम करें। कोई ऐसा काम न करें जिससे उसकी अध्यात्मिकता और पवित्रता पर आंच आए। बात चाहे जिस धर्म अथवा संप्रदाय की हो, हर जगह यही भावना पाई जाती है। इस मामले में किसी भी धर्म में कोई भेद-भाव नहीं है। पवित्रता के प्रभावित होते ही आध्यात्मिकता का पहलू भी कमजोर पड़ने लगता है जो किसी भी लिहाज से एक सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इस परिप्रेक्ष्य में सऊदी अरब के शहर मक्का में स्थित ‘खाना-ए-काबा’ (अल्लाह का घर) और उसकी देखभाल करने वालों की सक्रियता से इसकी महत्ता का अनुमान भली भांति लगाया जा सकता है। मुसलमानों के लिए यह स्थल बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक स्तंभ के तौर पर इसका उल्लेख मिलता है। हर साल अरबी महीने जिलहिज्जा में यहां हज संपन्न होता है। विश्व भर से मुसलमान यहां आकर हज करते हैं और कुर्बानी देते हैं। आर्थिक रूप से संपन्न हर मुसलमान के लिए जीवन में एक बार उस घर तक जाना अनिवार्य है। काबा भौगोलिक दृष्टि से दुनिया के मध्य में स्थित है। हज के दिनों को छोड़कर बाकी दिनों में विश्व भर से मुसलमान उमरा करने यहां आते हैं। इस लिहाज से पूरे साल ही यहां चहलपहल और गहमागहमी रहती है।
हज के लिए हर साल लगभग 25 लाख व्यक्ति काबा में हाजिरी के लिए उपस्थित होते हैं। अकेले भारत से एक लाख से अधिक लोग हज कमेटी के माध्यम से हज के लिए जाते हैं। जबकि प्राइवेट आपरेटरों के माध्यम से जाने वाले लोगों की संख्या इसके अतिरिक्त है जो लगभग 50 हजार के करीब है। सऊदी सरकार ने हज के दौरान जहां हाजी आते हैं, बढ़ती भीड़ को देखते हुए उन स्थानों का विस्तार किया है। यहां तक कि हाजियों के रहने के लिए पुराने भवनों को तोड़कर नए भवन बनाए जा रहे हैं। इससे हाजियों को और भी आसानी हो रही है। लेकिन इसी के साथ काबा के चारों तरफ जिस तरह ऊंचे टावर वाले होटल और भवन बनाए जा रहे हैं, वह आम मुसलमानों के लिए चिंता का विषय है। यह होटल साधारण होटल नहीं है बल्कि इनका स्तर फाइव स्टार होटल से भी ज्यादा अर्थात फाइव प्लस है। ये होटल सभी जन सुविधाओं से लैस पश्चिमी तर्ज पर आधारित हैं। जिनमें पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का जलवा है। खाना-ए-काबा जो जमीन पर है, चारांे तरफ से घिरी इमारतों के बीच कैसा लगेगा और क्या उसकी पवित्रता बाकी रहेगी! इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। गत कुछ दशकों से काबा स्थित मक्का शहर में एक नया इनफ्रास्ट्रक्चर परवान चढ़ रहा है, जिसमें होटल से लेकर शापिंग मॉल आदि सभी हैं। एक प्रकार से यहां हज इंडस्ट्री वजूद में आ रही है। और जब किसी जगह इंडस्ट्री वजूद में आती है अथवा कोई वस्तु बाजार में चल पड़ती है तो एक नया वर्ग वजूद में आता है। दोनों ही परिस्थितियों में मुनाफा कमाने एवं कारोबारी मानसिकता का पैदा होना आवश्यक है। सच तो यह है कि कारोबारी मानसिकता ही चीजों को व्यापारी शक्ल प्रदान करती है।
सऊदी सरकार जो हाजियों की सेवा तत्परता से करती है। बदलते परिदृश्य में उसकी सोच भी बदलती जा रही है। निःस्वार्थ सेवा भाव की जगह व्यापारी मानसिकता बढ़ती जा रही है। इसके लिए नए-नए उपाय और योजनाएं बनाई जा रही हैं। काबा के चारों तरफ जिस तेजी से ऊंची-ऊंची इमारतें और होटल बनाए जा रहे हैं। वह आम हाजियों की पहुंच से दूर होंगे, क्योंकि इन होटलों में वही हाजी ठहर सकेगा जो अपनी जेब ढीली करने के लिए तैयार होंगे। जबकि आम हाजी जिसका अपना एक सीमित बजट है, वह यहां ठहर नहीं सकता। हज कमेटी ऑफ इंडिया के वाइस चेयरमैन हसन अहमद ने भी इस बात को स्पष्ट किया कि हज के दौरान सऊदी अरब में निवास अब महंगा हो गया है। यदि हाजी काबा से करीब रहना चाहे तो उसे और ज्यादा खर्च करने के लिए तैयार रहना चाहिए। सऊदी सरकार ने ऐसा कर उस मानसिकता को भुनाने की कोशिश की है, जो काबा से करीब ठहरना चाहते हैं। इससे जहां उनकी मनोकामना पूरी होगी वहीं सऊदी सरकार की भी आमदनी बढ़ेगी। काबा के चारों तरफ बन रहे होटल और भवन आम लोगों के नहीं हैं। उन्हें इस क्षेत्र में किसी तरह के निर्माण कार्य करने की इजाजत भी नहीं है। यह अधिकार सिर्फ शाही परिवार को है। वे ही इन होटलों अथवा भवनों के मालिक हैं।
जहां तक खाना-ए-काबा का मामला है। इसकी मर्यादा के चलते ही इसके ऊपर से जहाज नहीं गुजरता है। लेकिन जब आसमान छूती इमारतें इसे चारों तरफ से घेर लेंगी तो क्या इसकी मर्यादा बचेगी, यह सवाल मुसलमानों को परेशानी किए हुए है। काबा जिसे हरम भी कहते हैं, उसके करीब एक 595 मीटर लंबी इमारत है जो 1952 फुट ऊंचे टावर की शक्ल का है और सबसे ऊंची है। इसी पर दुनिया की सबसे बड़ी घड़ी मक्का रायल क्लॉक टावर लगी है। दूसरे टॉवर का काम भी जोरों पर है। अगर यह जिस दिन पूरी तरह तैयार हो गया उस दिन काबा पूरी तरह ढक जाएगा।
काबा का मान-सम्मान हर मुसलमान के लिए सर्वोपरि है। इसे भंग करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती, चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो अथवा सामूहिक स्तर पर या किसी सरकार द्वारा हो। हाजियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सऊदी सरकार का दायित्व है कि वह इनके लिए नए भवन व होटल बनाए। लेकिन वह काबा से 100-150 किलोमीटर दूर हो।
व्यापारी मानसिकता केवल शासक वर्ग में ही नहीं है, अब इसके कीटाणु नागरिकों में भी फैल गए हैं। काबा में नमाज पढ़ने की इच्छा हर मुसलमान की होती है। जब वह वहां पहुंच जाता है तो उसकी कोशिश होती है कि आगे की पंक्ति में बैठे। इसके लिए कुछ सऊदी नागरिकों ने अपने लोगों को लगा दिया कि वह आगे की पंक्तियों में जा-ए-नमाज (जमीन पर बिछा कर नमाज पढ़ने वाला कपड़े का टुकड़ा) बिछा कर बैठ जाए। जब कोई संपन्न हाजी उस व्यक्ति को इस जगह के बदले कुछ रुपए दे देता तो वह जगह उसके हवाले कर दी जाती। यह एक कारोबार की शक्ल में जारी था। पांच समय की नमाज एवं इतने बडे़ काबा में जहां एक साथ एक लाख से अधिक लोग नमाज पढ़ सकते हैं, जगह घेर कर पैसा वसूल करना अच्छा व्यापार था। काबा में केवल हज के समय ही भीड़ नहीं रहती है बल्कि वहां तो साल के 12 महीने ही भीड़-भाड़ और चहल-पहल रहती है। इसका रहस्योद्घाटन उस समय हुआ जब कुछ लोगों ने इस तरह पैसा वसूल करने की शिकायत की। जिसके बाद सरकार सक्रिय हुई और उन्होंने इसका संज्ञान लिया। लेकिन सवाल यह है कि जब व्यापारी सोच की मानसिकता सत्ता वर्ग में आ गई है तो आम नागरिक उससे कैसे बच सकेगा!
बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब व्यवस्था को पुण्य कार्य समझते हुए भारतीय मुसलमानों द्वारा सऊदी अरब में निवास के लिए भवन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाते थे। अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार कई भारतीय मुसलमानों ने इस तरह की व्यवस्था कर रखी थी, जिन्हें रूबात कहा जाता है। अब इन पुराने भवनों को तोड़कर नया बनाया जा रहा है। लेकिन इसमें भारतीय मुसलमानों की भूमिका नहीं के बराबर है। यह ज्यादातर शाही परिवार के सदस्यों की मिल्कियत है। ये उन्हें किराए पर देने के लिए अपने एजेंट रखते हैं जो विभिन्न देशों से आने वाले हाजियों को इन भवनों में रहने के लिए तैयार करते हैं, जिस पर उसे कमीशन मिलता है। हज कमेटी ऑफ इंडिया पर भी यह आरोप है कि वह शाही परिवार के सदस्यों की कम सुविधा वाली भवनों को ज्यादा किराए पर हाजियों के लिए लेती है। साथ ही हाजियों से जिस श्रेणी का किराया वसूल किया जाता है, उन्हें वहां न ठहरा कर अत्यंत घटिया मकान में ठहराया जाता है। इस संबंध में हज प्रतिनिधि मंडल में गए हैदराबाद के जस्टिस फखरूद्दीन ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए इसकी जांच की मांग की है। हज के दौरान आम तौर पर हाजियों के निवास को लेकर अक्सर शिकायतें आती हैं, जिसकी कोई सुनवाई नहीं होती है। उसे यह कह कर ठंडा करने की कोशिश की जाती है कि हज एक तरह का परिश्रम है, इसके रास्ते में जो परेशानी एवं कठिनाई आए उसे हंसते हुए बर्दाश्त करना चाहिए। इस तरह अपने दायित्वों का निर्वाह करने के बजाए हाजियों की भावनाओं का शोषण किया जाता है।

Friday, February 11, 2011

राजनीति का मोहरा बना दारुल उलूम

किसी चिंतक ने सच ही कहा है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। ठीक यही मामला देवबद स्थित अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्था दारुल उलूम का है। लगभग तीस साल के बाद यह दूसरा मौका है जब दारुल उलूम के मोहतमिम (कुलपति) पद को लेकर विवाद अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। अतीत में हुए इस विवाद के चलते ही दारुल उलूम का विभाजन हुआ था। दारुल उलूम की मजलिस शूरा (कार्यकारिणी) के फैसले की बुनियाद पर ही उसके मोहतमिम कारी मोहम्मद तैयब ने दारुल उलूम (वक्फ) बनाकर अपनी राह अलग पकड़ी और जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना असद मदनी की दारुल उलूम पर पकड़ मजबूत हो गई। कहा जाता है कि ऐसा कांग्रेस की नीति के चलते हुआ क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुसलमानों की एकजुटता को खत्म कर उन्हें कमजोर करना चाहती थीं। वर्तमान विवाद को इस प्ररिप्रेक्ष्य से अलग कर नहीं देखा जा सकता। फर्क केवल इतना है कि तब मजलिस शूरा ने मदनी परिवार के हक में अपना मत दिया था और अब तीस साल बाद उसने मदनी परिवार को दारुल उलूम से बेदखल कर दिया है।
दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मरगूर्बुरहमान के निधन के बाद 10 जनवरी को मजलिस शूरा ने अपनी बैठक में बहुसंख्यक मतों के आधार पर मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को दारुल उलूम के मोहतमिम की जिम्मेदारी सौंपी थी। 21 सदस्यीय शूरा में 4 सदस्यों का निधन हो चुका है, जिनका चुनाव किया जाना बाकी है। जबकि तीन सदस्य किन्हीं कारणों से बैठक में शरीक नहीं हुए। इस तरह 14 सदस्यों में से 8 ने मौलाना वस्तानवी को मोहतमिम बनाने के पक्ष में वोट दिया। चार सदस्यों ने इनके प्रतिद्वंद्वी जमीअत उलेमा हिंद के दूसरे घडे़ के अध्यक्ष एवं दारुल उलूम के शिक्षक और मौलाना वस्तानवी के रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी के पक्ष में और दो सदस्यों ने दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मदरासी के पक्ष में अपना मत दिया। साफ और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से हताश मौलाना अरशद मदनी के एक रिश्तेदार एवं शूरा सदस्य मौलाना अब्दुल अलीम फारूकी ने यह शिगूफा छोड़ दिया कि मौलाना वस्तानवी कासमी नहीं है। इस पद पर किसी कासमी को ही आसीन करना चाहिए। बतातें चलें कि दारुल उलूम से शिक्षा प्राप्त करने वालों को कासमी कहा जाता है। ऐसा वह मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी द्वारा दारुल उलूम का गठन किए जाने की याद में अपने नाम के आगे लगाकर करते हैं। कोई कासमी मोहतमिम हो, दारुल उलूम का संविधान इस बाबत मौन है। मोहतमिम के चयन का पूरा अधिकार मजलिस शूरा को दिया गया है।
मजलिस शूरा के इस फैसले की अभी स्याही सूखी भी नहीं थी कि मौलाना वस्तानवी के अतीत के कुछ कामों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए साक्षात्कार में मौलाना वस्तानवी ने कहा कि गुजरात में मुसलमानों के साथ भेद-भाव नहीं किया जा रहा है। राज्य में मुसलमानों की आर्थिक स्थित अच्छी है। उन्होंने यह भी कहा कि 8 वर्ष पूर्व हुए दंगों को अब याद करने का औचित्य नहीं है। मौलाना वस्तानवी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में बयान देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इसे लेकर मुसलमानों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या चर्चा में बने रहने के लिए दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। पूर्व में मौलाना मरगूर्बुरहमान के समय इसकी शुरुआत हो चुकी थी लेकिन तब वह एक सीमित दायरे में थी। अब जिस तरह खुल कर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, उससे आम मुसलमानों की नाराजगी बिल्कुल स्वाभाविक है। राजनैतिक पार्टियां जिस तरह दिल्ली स्थित जामा मस्जिद को अपने हित के लिए इस्तेमाल करती हैं बिल्कुल उसी तरह दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। जानकारों को इस बात पर आश्चर्य है कि मोलाना वस्तानवी गुजरात जाने के बाद दारुल उलूम की बाबत कहने के बजाए मोदी के राज्य में मुसलमान खुशहाल हैं और वह उन्नति कर आगे बढ़ रहे हैं, जैसे बयान दे रहे हैं। इससे उनकी दिलचस्पी का अनुमान लगाया जा सकता है।
बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि एक उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ ने पहले पेज पर उस फोटो को छापकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसमें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मौलाना वस्तानवी के हाथों एक मूर्ति पेश करते दिखाया गया था। यह फोटो कोई साल भर पहले के एक कार्यक्रम का है। इस फोटो ने मौलाना वस्तानवी के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। दारुल उलूम के कुछ शिक्षकों ने भी इस बयान को दारुल उलूम की साख को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। साथ ही दारुल उलूम की मजलिस शूरा से अपने फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया। तनजीम मुहिब्बान दारुल उलूम, देवबंद ने तो शूरा के फैसले पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। तनजीम के महासचिव मौलाना अरशद रजा कासमी बिजनौरी ने शूरा से सवाल किया है कि क्या दारुल उलूम इतना बांझ हो गया है कि इससे पढ़कर निकलने वाले उलेमा में से कोई नहीं मिल सका कि उसे दूसरी संस्था के पढ़े हुए को लेना पड़ा।
पूरे मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल जिनका संबंध भी गुजरात से है और वे मौलाना वस्तानवी के करीबी रिश्तेदार हैं, का बयान उक्त उर्दू दैनिक में प्रकाशित हुआ। जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दारुल उलूम का मोहतमिम किसी योग्य व्यक्ति को बनाया जाए। मौलाना वस्तानवी इस पद के लायक नहीं हैं। उन्होंने अपने इस बयान में मौलाना वस्तानवी के पुत्र मुफ्ती हुजैफा के दावे को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि अहमद पटेल उसके नाना हैं और गुजरात एवं महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई में वह जो चाहते हैं, वही होता है। पटेल ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति मोदी का दोस्त हो सकता है वह मेरा कैसे हो सकता है।
इसी बीच मौलाना वस्तानवी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया का जो बयान उनसे संबंधित बताया जा रहा है, उसे तोड़ मोड़कर पेश किया गया है। मैं ऐसी कोई बात जो दारुल उलूम देवबंद और अपने बुजुर्गों की परंपरा एवं मान-सम्मान के खिलाफ है, को सोच भी नहीं सकता। मूर्ति के संबंध में उन्होंने कहा कि यह उनके दुश्मनों का षड्यंत्र है। वस्तानवी ने कहा कि गत वर्ष नवंबर में ईद मिलन समारोह के अवसर पर जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शरीक थे, उन्हें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मोमेंटो पेश करना था। उस पर तस्वीर बनी हुई थी, वह मूर्ति नहीं थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि तस्वीर और मूर्ति में बड़ा फर्क है। जो लोग इस तस्वीर को मूर्ति कह रहे हैं, वह गलत कह रहे हैं।
मौलाना वस्तानवी दीनी शिक्षा के साथ ही आधुनिक शिक्षा में दक्षता रखते हैं। वे गुजरात के निवासी हैं। वे गुजरात एवं महाराष्ट्र में कई कॉलेज एवं मदरसे चला रहे हैं जिनमें हजारों लड़के शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। मजलिस शूरा ने उनका चयन एक ऐसे समय में किया है जब मदरसों की विचारधारा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है। दूसरी ओर उनके करीबी रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी जो मदनी परिवार के मुखिया हैं, की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात को कांग्रेस एजेंडा को लागू करने के संदर्भ में देखा जा रहा हैं। जानकर मानते हैं कि अहमद पटेल पहले वस्तानवी के समर्थक थे। उन्होंने इसलिए पाला बदला कि वस्तानवी के दारुल उलूम में आने से मुसलमानों को कांग्रेस के करीब लाने में परेशानी होगी। इसके विपरीत मौलाना अरशद मदनी के आने से उत्तर भारत में मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने में कामयाबी मिलेगी। चर्चा यह भी है कि 10 जनपथ से इसका ब्लू प्रिंट तैयार हो गया है? लेकिन ऐसा कैसे होगा? क्या मजलिस शूरा जिसने मौलाना अरशद मदनी के खिलाफ फैसला दिया था, पर राजनैतिक दबाव डाला जाएगा या फिर उसमें जो जगहें खाली हैं, उन पर ऐसे लोगों को लाने की कोशिश होगी जो इस मिशन को पूरा करने में अपना सहयोग देंगे। ऐसे ही सवालों पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।